Saturday, August 15, 2009

हद

सितम डाहने की भी हद होती है
हुस्न की बिजली गिराने की भी हद होती है
काफिला तो निकल पड़ा है
ख़ुद को अलग बताने की भी हद होती है
प्यार बहुत है आँखों में तुम्हारे
लेकिन नज़र बचाने और शर्माने की भी हद होती है
यु तो चाहत बहुत है
लेकिन नही बताने की भी हद होती है
मुझे भूलना नही चाहती शायद तुम
लेकिन भूलने का नाटक करने की भी हद होती है
ख़ुद को ज़माने से अलग नही देख सकोगी ये पता है मुझे
लेकिन मेरी आर्मानो का गला दबाने की भी हद होती है
हद से जयदा करने की भी हद होती है
और हद से कम करने की भी हद होती है !!!!!!!!!!

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