Saturday, August 15, 2009

रात (08/08/09)

कभी ऐतबार से देखा है, रात के इन रास्तो को .....
कभी सुकून से सुना है, इन पहियों की थाराथ्त को......
क्यूँ रात की खामोशिया आवाज़ करती है
दस्तक ये हर जगह सरेआम करती है

क्यों नाज्दिक्यो से दूर ये खामोश रात है
क्यूँ लगता है की इसके दिल में दबी-दबी सी एक बात है
क्यूँ उलझनों से दूर उलझनों में ये रात है
क्यूँ अंजानो से बढ़ कर ये रात है
क्यूँ आपनो में बैठे बेगानों सी ये रात है
क्यूँ आर्मानो से हट कर ये रात है
क्यूँ इस दुनिया से परे दिल की गहरायियो में ये रात है
शायद आपनो को न भूलने को ये रात है
शायद जिंदगी में एक सुकून भरने को ये रात है
शायद आर्मानो को समेटने को ये रात है
शायद भूले रास्तो को जोरने को ये रात है
शायद दिल में एक उमग भरने को ये रात है
अब छाए जैसी भी ये रात है
एक नए सबेरे के इंतज़ार में ये रात है !!!!!!!!

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